हिन्दू धार्मिक कट्टरवाद : इस्लाम और ज़िहाद का प्रादुर्भाव
ढाई इंच की चमड़े की लचीली ज़ुबान से ब्राह्मणों, ठाकुरों, वैश्यों और वर्णव्यवस्था को गाली देने में कत्तई मेहनत नहीं लगती

कोई भी दे सकता है। लेकिन मेहनत लगती है 2500 वर्षो के इतिहास का सही अवलोकन करने में जो कोई करना नहीं चाहता।

मैं भली भाँति जानता हूँ की 25-30 से ज्यादा लोग इस लेख को पूरा पढ़ेंगे भी नहीं, न ही मेरे इस लेख से कोई वैचारिक क्रांति ही आएगी, न ही हिन्दू लड़ना छोड़ेंगे और न ही एक भी “जय भीम” कहने वाला अपनी सोच बदल लेगा। लेकिन जो लोग जानकारी के अभाव में जब कट्टर वर्णव्यवस्था के कारण अपराधबोध से ग्रस्त अपने आपको तर्कहीन महसूस करते हैं, वे इसे अंत तक जरूर पढ़ें। इस लेख को ब्राह्मणों की वकालत न समझ कर, सिर्फ हिन्दुओं की गलतफहमी और आपसी मतभेद दूर करने के नज़रिये से बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर पढ़ें तथा मनन करें की एक पक्षीय और अधूरे इतिहास को पढ़ाने का ही नतीजा है आज हिन्दू समाज में फैली हुई वैमनस्यता तथा मतान्तर।

लेख बहुत लम्बा और बोरिंग न हो जाये इसलिए बहुत संक्षेप में लिखने का प्रयत्न किया हैं ,तथा इतिहास की कुछ पुस्तकों के नाम अंत में भी दिए हैं , जिन्हे कोई शक शुबा हो वे उन पुस्तकों का अध्ययन करके अपना मत निर्धारित कर सकते हैं।

पिछले चार दिनों में एक साथ निम्न चार वाक्यों ने मुझे आज लिखने के लिए मजबूर कर दिया जय भीम जय मीम, वालो ने।

चलो हिन्दू धर्म और धर्म ग्रंथो को छोड़ कर नास्तिक हो जाएँ। (फेसबुक, गूगल+ पर एक पोस्ट)

कल फेसबुक पर मेरे एक कमेंट के जवाब में यह प्रतिउत्तर आना –“क्या कमाल है विदेशी लोग बता रहे है ‘जय भारत’ पहले आना चाहीये”।

या जब कभी मैं जाति प्रथा की कट्टरता के लिए मात्र दो पक्षों को कटघरे में खड़ा पाता हूँ और फिर हिन्दुओं को आपस में फेसबुक, गूगल, या फिर धरातल पर लड़ता हुआ पाता हूँ तो मन कराह उठता है, कि हम लोगों ने 1500 वर्षों की शारीरिक गुलामी ही नहीं की बल्कि इतने कट्टर मानसिक गुलाम हो गए की जहाँ वो अकबर तो महान हो गया जिसके राज में 500000 लोगों को गुलाम बना मुसलमान बना दिया गया, लेकिन उसकी सत्ता न मनाने वाले चित्तौड़गढ़ के 38000 राजपूतों को कटवा दिया था, उस का महिमामंडन करने के लिए एकतरफा चलचित्र भी बने, ग्रन्थ भी लिखे गए और सीरियल भी बने लेकिन महाराणा प्रताप, रानी लक्ष्मी बाई को दो पन्नो में समेट दिया गया और पन्ना धाय को तो बिल्कुल ही विस्मृत कर दिया गया।

बात शुरू करता हूँ, उन अतिज्ञानियों के ज्ञान से जिन्होंने शायद ही कभी “मनु समृति”का अध्ययन किया होगा लेकिन जयपुर हाई कोर्ट परिसर में महर्षि मनु की 28 जून 1989 को मूर्ती लगने पर विरोध प्रगट किया और 28 जुलाई 1989 को हाई कोर्ट की फुल बेंच ने अपने पूरे ज्ञान का परिचय देते हुए 48 घंटे में मूर्ती हटाने का आदेश पारित कर दिया लेकिन दूसरी तरफ से भी अपना पक्ष रखा गया और तीन दिन के लगातार बहस के दौरान मनु के आलोचक पक्ष के वकील मनु को गलत साबित नहीं कर पाये और एक अंतरिम आदेश के साथ अपना पूर्व में मूर्ती हटाने का आदेशहाई कोर्ट को स्थगित करना पड़ा। मूर्ती आज भी यथावत है।

अब इससे पीछे चलते हैं वर्तमान के दलित मसीहा, रामविलास पासवान पर क्या उन्होंने अपनी पहली पत्नी को तलाक दे कर उन पर अत्याचार नहीं किया? या यहाँ पर भी नीना शर्मा (एक पंजाबी ब्राह्मण), उनकी दूसरी पत्नी जिसने एक दलित से शादी की, ने ब्राह्मणत्व की धारणा को तोड़ कर एक दलित से शादी नहीं की।

इससे और पीछे चलते हैं, भीम राव अम्बेडकर पर  “जय भीम” तो बहुत बोला जाता है, क्या डा. सविता, बाबा साहेब आंबेडकर की पत्नी जो की पुणे के कट्टर ब्राह्मण परिवार से थीं, उन्होंने क्या जातिपाति के बंधनों की परवाह की थी? और अम्बेडकरवादियों ने बहुत कुशलता से आंबेडकर द्वारा रचित The Buddha And His Dharma जो की उनकी मृत्यु के पश्चात प्रकाशित हुई की मूल प्रस्तावना जो की उन्होंने 15 मार्च 1956 लिखी थी, को छुपा दिया जिसमे उन्होंने अपनी ब्राह्मण पत्नी और उन ब्राह्मण अध्यापकों (महादेव आंबेडकर, पेंडसे, कृष्णा जी अर्जुन कुलेसकर, बापूराव जोशी) की हृदयस्पर्शी चर्चा की थी। बहुत आसान है महादेव आंबेडकर का भीमराव को अपने घर में खाना खिलाना भूलना, बहुत आसान है सविता देवी का जीवन भुलाना और बहुत आसान है कृष्णा जी अर्जुन कुलेसकर नामक उस ब्राह्मण को भुलाना जिसने भीमराव को “महात्मा बुद्ध” पर पढ़ने को पुस्तक दी और भीमराव बौधि हो गए।
उपरोक्त उदाहरणों से मैं यह सिद्ध करने की कोशिश नहीं कर रह हूँ कि उस समय वर्णव्यवस्था का कट्टरपन अपने चरमोत्कर्ष पर नहीं था। बहुत विद्रूपता थी उस समय काल में और इससे पहले वर्णव्यवस्था में। लेकिन वर्णव्यवस्था में विद्रूपता और कट्टरपन क्यों कब और कैसे आया, क्या कभी किसी ने वामपंथियों द्वारा रचित इतिहास के इतर कुछ पढ़ने की कोशिश की ? जो और जितना पढ़ाया गया उसी को समग्र मान कर चल पढ़े भेड़चाल और लगे धर्मग्रंथों और उच्च जातियों को गलियां देने!

मनु स्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों में वर्णव्यवस्था “कर्म आधारित” थी और कर्म के आधार पर कोई भी अपना वर्ण बदलने के लिए स्वतंत्र था। आज का समाज जाती बंधन तो छोड़िये किसी भी बंधन को न स्वीकारने के दसियों तर्क कुतर्क दे सकता है। लेकिन वर्णव्यस्था पर उंगली उठाने वालों के लिए “vedictruth: वेद और शूद्र ” vedictruth.blog

http://spot.com में एक सारगर्भित लेख है। इसके बाद भी कोई अगर कुतर्क दे तो उसे मानव मन का अति कल्पनाशील होना ही मानूँगा।

इतिहास में बहुत पीछे न जाते हुए, चन्द्रगुप्त मौर्य (340 BC 298 BC) से शरुआत करते हुए बताना चाहूँगा, कि चन्द्रगुप्त के प्रारंभिक जीवन के बारे में तो इतिहासकारों को बहुत कुछ नहीं मालूम है परन्तु, “मुद्राराक्षस” में उसे कुलविहीन बताया गया है, जो कि बाद में चल कर यदि उस समय वर्णव्यवस्था थी तो उसे तोड़ते हुए अपने समय का एक शक्तिशाली राजा बना। उसी समय “सेल्यूकस” के दूत “मैगस्थनीज़” के यात्रा वृतांत के अनुसार उस समय इसी चतुर्वर्ण में ही कई जातियाँ 1) दार्शनिक 2) कृषि 3) सैनिक 4) निरीक्षक /पर्यवेक्षक 5) पार्षद 6) कर निर्धारक 7) चरवाहे 8) सफाई कर्मचारी और 9) कारीगर हुआ करते थे। लेकिन चन्द्रगुप्त के प्रधानमंत्री “कौटिल्य” के अर्थशास्त्र एवं नीतिसार अनुसार, किसी के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार की कठोर सज़ा थी। यहाँ तक की वैसे तो उस समय दास प्रथा नहीं थी लेकिन चाणक्य के अनुसार यदि किसी को मजबूरी में खुद दास बनना पड़े तो भी उससे यदि कोई नीच अथवा अधर्म का कार्य नहीं करवाया जा सकता था। ऐसा करने की स्थिति में दास दासता के बन्धन से स्वमुक्त हो जाता था। सब अपना व्यवसाय चयन करने के लिए स्वतंत्र थे तथा उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वे धर्मानुसार उनका निष्पादन करेंगे। मौर्य वंश के इतिहास में कहीं भी शूद्रों के साथ अमानवीय या भेदभावपूर्ण व्यवहार का लेखन पढ़ने में नहीं आया। जब दासों के प्रति इतनी न्यायोचित व्यवस्था थी, तो आम जन तो नीतिशास्त्रों से शासित किये ही जाते थे। एक बात का और उल्लेख यहाँ करना चाहूंगा, उस समय तक वैदिक भागवत धर्म का अधिकांश लोग पालन करते थे लेकिन बौद्ध तथा जैन धर्मों में अपने प्रवर्तकों की सुन्दर सुन्दर मूर्तियों की पूजा की देखा देखि इसी समय पर वैदिक धर्म में मूर्ती पूजा का प्रादुर्भाव हुआ। इसी समय पर भगवानों के सुन्दर सुन्दर रूपों की कल्पना कर के उन्हें मंदिरों में प्रतिस्थापित किया जाने लगा।

चन्द्रगुप्त मौर्य के लगभग 800 वर्ष पश्चात चीनी तीर्थयात्री “फाह्यान” चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय भारत आया उसके अनुसार वर्णव्यवस्था बहुत कठोर नहीं था, ब्राह्मण व्यापार, वास्तुकला तथा अन्य प्रकार की सेवाएं दिया करते थे, क्षत्रिय वाणिज्यिक एवं औद्योगिक कार्य किया करते थे, वैश्य राजा ही थे, शूद्र तथा वैश्य व्यापार तथा खेती बाड़ी करते थे। कसाई, शिकारी, मछली पकड़ने वाले, मांसाहार करने वाले अछूत समझे जाते थे तथा वे नगर के बाहर रहते थे। गंभीर अपराध न के बराबर थे, अधिकांश लोग शाकाहारी थे। इसीलिए इसे भारतवर्ष का स्वर्ण काल भी कहा जाता है।

यही बातें “हुएंन त्सांग “ने वर्ष 631-644 तक अपने भारत भ्रमण के दौरान लिखीं। उस समय विधवा विवाह पर प्रतिबन्ध नहीं था, सती प्रथा नहीं थी, पर्दा प्रथा नहीं था, दास प्रथा नहीं था, हिजड़े नहीं बनाये जाते थे, जौहर प्रथा नहीं था, ठगी गिरोह नहीं हुआ करते थे, क़त्ल नहीं हुआ करते थे, बलात्कार नहीं हुआ करते थे, सभी वर्ण आपस में बहुत सौहाद्रपूर्ण तरीके से रहते थे और … वर्ण व्यवस्था इतनी कट्टर नहीं थी। यह भारत का स्वर्णकाल कहलाता है। फिर ये सारी कुरीतियां वैदिक धर्म में कहाँ से आ गयीं?

इसी स्वर्णकाल के समय लगभग वर्ष 500 में जो तीन विशेष कारण जिनकी वजह से वैदिक धर्म का लचीलापन खत्म होने की शुरुआत, तथापि यूरोप से जाहिल हूणों के आक्रमण तथा उनका भारतीय समाज में घुलना मिलना, बौद्ध धर्म में “वज्रायन” सम्प्रदाय जिसके भिक्षु एवं भिक्षुणियों ने अश्लीलता की सीमाएं तोड़ दी थी, तथा बौद्धों द्वारा वेद शिक्षा बिल्कुल नकार दी गई थी एवं “चर्वाक” सिद्धांत पंच मकार  मांस, मछली, मद्य, मुद्रा और मैथुन ही जीवन का सार थे के जनसाधारण में लोकप्रिय होना।
इस सन्दर्भ में नेहरू और वामपंथियों पर भारतीय मूल के ब्रिटेन में रहने वाले प्रख्यात लेखक V.S Naipaul ने कटाक्ष करते हुए “The Pioneer” समाचार पात्र में एक लेख लिखा —- “आप अपने इतिहास को नज़रअंदाज़ कैसे कर सकते हैं? लेकिन स्वराज और आज़ादी की लड़ाई ने इसे नज़रअंदाज़ किया है! आप जवाहर लाल नेहरू की Glimpses of World History पढ़ें, ये भारतीय पौराणिक कथाओं के बारे में बताते बताते आक्रान्ताओं के आक्रमण पर पहुँच जाता है। फिर इस चीन से आये हुए तीर्थयात्री बिहार नालंदा और अनेकों जगह पहुँच जाते हैं। पर आप यह नहीं बताते की फिर क्या हुआ, क्यों आज अनेकों जगह जहाँ का गौरवपूर्ण इतिहास था खंडहर क्यों हैं? आप यह नहीं बताते की भुबनेश्वर, काशी और मथुरा को कैसे अपवित्र किया गया।”
वर्णव्यवस्था के लचीलेपन के ख़त्म होने के एक से बढ़ कर एक कारण हैं, लेकिन जो मेरी नज़र में सबसे अहम कारण है उसे सबसे अंत में लिखुंगा।
लेकिन जो इतिहास हमें पढ़ाया गया है, उसमे सोमनाथ के मंदिर को लूटना तो बताया गया है लेकिन महमूद ग़ज़नवी ने कंधार के रास्ते आते और जाते हुए मृत्यु का क्या तांडव खेला ये कभी नहीं बताया जाता। उसमें 1206 के मोहम्मद गौरी से लेकर 1857 तक के बहादुर शाह ज़फर अधूरा चित्रण ही आपके सामने किया गया है, पूरा सच शायद बताने से मुस्लिम वर्ग नाराज़ हो जाता।

वीर सावरकर ने 1946 लिख दिया था, कि लम्बे समय तक सत्ता में बने रहने के लिए तत्कालीन कांग्रेस के नेताओं ने यही रणनीति बनायीं थी कि, हिन्दुओं में फूट डाली जाये और मुस्लिमों का तुष्टिकरण किया जाये।

इसी का आज यह दुष्परिणाम है की न तो मुस्लिम आक्रान्ताओं का पूरा इतिहास ही पढ़ाया गया और आज हिन्दू पूरी जानकारी के अभाव में वर्णव्यवस्था के नाम पर चाहे सड़क हो चाहे फेसबुक कहीं पर भी भिड़ जाते हैं।

जी हाँ हमारा इतिहास हमें यह नहीं बताता की वर्ष 1000 में की भारत की जो जनसँख्या 15 करोड़ थी  वर्ष 1500 में घटकर 10 करोड़ क्यों रह गयी थी ? इसके मुख्य कारण थे – जबरन धर्म परिवर्तन, बलात्कार, कत्ले आम, कम उम्र के लड़कों का हिजड़ा बनाया जाना इत्यादि।

(नीचे दिए गए ref. 1. Islam’s India slave Part-1 by M.A Khan, 2. The Legacy of Jihad: Islamic Holy war and the fate of  non Muslims by A.G Bostom और  3. Slave trading During Mulim rule by K.S Lal से लिए गए हैं )।

http://islammonitor.org/index.php

– उपरोक्त पुस्तक जो की कई अन्य पुस्तकों का निचोड़ हैं, का सारांश निम्नवत है:

1). महमूद ग़ज़नवी –वर्ष 997 से 1030 तक 2000000, बीस लाख जी हाँ सिर्फ बीस लाख लोगों को महमूद ग़ज़नवी ने तो क़त्ल किया था और 750000 सात लाख पचास हज़ार लोगों को गुलाम बना कर भारत से ले गया था 17 बार के आक्रमण के दौरान (997 -1030). जिन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया, वे शूद्र बना कर इस्लाम में शामिल कर लिए गए। इनमे ब्राह्मण भी थे, क्षत्रिय भी, वैश्य भी और शूद्र तो थे ही।
2). दिल्ली सल्तनत 1206 से 1210 — कुतुबुद्दीन ऐबक ने सिर्फ 20000 गुलाम राजा भीम से लिए थे और 50000 गुलाम कालिंजर के राजा से लिए थे। जो नहीं माना उनकी बस्तियों की बस्तियां उजाड़ दीं गयीं। गुलामों की उस समय यह हालत हो गयी कि गरीब से गरीब मुसलमान के पास भी सैंकड़ों हिन्दू गुलाम हुआ करते थे।
3). इल्ल्तुत्मिश 1236 जो भी मिलता उसे गुलाम बना कर, उस पर इस्लाम थोप देता था।
4).  बलबन् 1250-60  ने एक राजाज्ञा निकल दी थी, 8 वर्ष से ऊपर का कोई भी आदमी मिले उसे मौत के घाट उतार दो, महिलाओं और बच्चों को वो गुलाम बना लिया करता था। उसने भी शहर के शहर खाली कर दिए।
5). अलाउद्दीन ख़िलजी  1296 – 1316 अपने सोमनाथ की लूट के दौरान उसने कम उम्र की 20000 हज़ार लड़कियों को दासी बनाया, और अपने शासन में इतने लड़के और लड़कियों को गुलाम बनाया जिनकी गिनती कलम से लिखी नहीं जा सकती। उसने हज़ारों क़त्ल किये थे और उसके गुलामखाने में 50000 लड़के थे और 70000 गुलाम लगातार उसके लिए इमारतें बनाने का काम करते थे। इस समय का ज़िक्र अमीर खुसरो के लफ़्ज़ों में इस प्रकार है “तुर्क  चाहे जहाँ से उठा लेते थे और जहाँ चाहे बेच देते थे।”
6). मोहम्मद तुगलक 1325 -1351 इसके समय पर इतने कैदी हो गए थे की हज़ारों की संख्या में रोज़ कौड़ियों के दाम पर बेचे जाते थे।
7). फ़िरोज़ शाह तुगलक 1351-1388 इसके पास 180000 गुलाम थे जिसमे से 40000 इसके महल की सुरक्षा में लगे हुए थे। इसी समय “इब्न बतूता ” लिखते हैं की क़त्ल करने और गुलाम बनाने की वज़ह से गांव के गांव खाली हो गए थे। गुलाम खरीदने और बेचने के लिए खुरासान, गज़नी, कंधार, काबुल और समरकंद मुख्य मंडियां हुआ करती थीं। वहां पर इस्तांबुल, इराक और चीन से से भी गुलाम लाकर बेचे जाते थे।
8). तैमूर लंग 1398-1399  इसने दिल्ली पर हमले के दौरान 100000 गुलामों को मौत के घाट उतरने के पश्चात, दो से ढ़ाई लाख कारीगर गुलाम बना कर समरकं और मध्य एशिया ले गया।
9). सैय्यद वंश 1400-1451  हिन्दुओं के लिए कुछ नहीं बदला, इसने कटिहार, मालवा और अलवर को लूटा और जो पकड़ में आया उसे या तो मार दिया या गुलाम बना लिया।
10). लोधी वंश 1451-1525 इसके सुल्तान बहलूल ने नीमसार से हिन्दुओं का पूरी तरह से वंशनाश कर दिया और उसके बेटे सिकंदर लोधी ने यही हाल रीवां और ग्वालियर का किया।
11). मुग़ल राज्य 1525 -1707  बाबर  इतिहास में ,क़ुरान की कंठस्थ आयतों ,कत्लेआम और गुलाम बनाने के लिए ही जाना जाता है।
12). अकबर 1556-1605 बहुत महान थे यह अकबर महाशय, चित्तौड़ ने जब इनकी सत्ता मानने से इंकार कर दिया तो इन्होने 30000 काश्तकारों और 8000 राजपूतों को तो मार ही दिया और एक दिन भरी दोपहर में 2000 कैदियों का भी सर कलम कर दिया था। कहते हैं की इन्होने गुलाम प्रथा रोकने की बहुत कोशिश की – फिर भी हरम में 5000 महिलाएं थीं। इनके समय में ज्यादातर लड़कों को खासतौर पर बंगाल की तरफ से अपहरण किया जाता था और उन्हें हिजड़ा बना दिया जाता था। इनके मुख्य सेनापति अब्दुल्लाह खान उज़्बेग, की अगर मानी जाये तो उसने 500000 पुरुष और गुलाम बना कर मुसलमान बनाया था और उसके हिसाब से क़यामत के दिन तक वह लोग एक करोड़ हो जायेंगे।
13). जहांगीर 1605 -1627 इन साहब के हिसाब से इनके और इनके बाप के शासन काल में 5 से 600000 मूर्तिपूजकों का क़त्ल किया गया था और सिर्फ 1619-20 में ही इसने 200000 हिन्दू गुलामों को ईरान में बेचा था।
14). शाहजहाँ 1628 – 1658 इसके राज में इस्लाम ही बस कानून था, या तो मुसलमान बन जाओ या मौत के घाट उतर जाओ। आगरा में एक दिन इसने 4000 हिन्दुओं को मौत के घाट उतारा था। जवान लड़कियां इसके हरम भेज दी जाती थीं।
15). औरंगज़ेब 1658-1707 इसके बारे में तो बस इतना ही कहा जा सकता है की , जब तक सवा मन जनेऊ नहीं तुलवा लेता था पानी नहीं पीता था। बाकि काशी और मथुरा इसी की देन हैं। मथुरा के मंदिर 200 सालों में बने थे इसने अपने 50 साल के शासन में मिट्टी में मिला दिया। मथुरा के प्रसिद्ध लाल पत्थर के सात तलों में से चार तल उसने इसलिए तुड़वा दिए क्योकि मंदिर के ऊपर रखने वाले दिए की रौशनी दिल्ली तक जाती थी।

गोलकुंडा में 1659 सिर्फ 22000 लड़कों को हिजड़ा बनाया था।
16). फर्रुख्सियार 1713 -1719  यही शख्स है जो नेहरू परिवार को कश्मीर से दिल्ली ले कर आया था, और गुरदासपुर मेंहज़ारूं सिखों को मारा और गुलाम बनाया था।
17). नादिर शाह 1738 भारत आया और सिर्फ 200000 लोगों को मौत के घाट उतार कर

हज़ारों सुन्दर लड़कियों को और बेशुमार दौलत ले कर चला गया।
18). अहमद शाह अब्दाली 1757-1760, 1761 की पानीपत की लड़ाई में मराठों से युद्ध के दौरान हज़ारों लोग मरे, और एक बार में यह 22000 लोगों को गुलाम बना कर ले गया था।
19). टीपू सुल्तान 1750 – 1799 त्रावणकोर के युद्ध में इसने 10000 हिन्दू और ईसाईयों को मारा था एक मुस्लिम किताब के हिसाब से कुर्ग में रहने वाले 70000 हिन्दुओं को इसने मुसलमान बनाया था।

गुलाम हिन्दू चाहे मूसलमान बने या नहीं, उन्हें नीचा दिखने के लिए इनसे अस्तबलों का, हाथियों को रखने का, सिपाहियों के सेवक होने का और बेइज़्ज़त करने के लिए साफ सफाई करने के काम दिए जाते थे। जो गुलाम नहीं भी बने उच्च वर्ण के लोग वैसे ही सब कुछ लुटाकर, अपना धर्म न छोड़ने के फेर में जजिया और तमाम तरीके के कर चुकाते चुकाते समाज में वैसे ही नीचे की पायदान पर पहुँच गए। जो आतताइयों से जान बचा कर जंगलों में भाग गए जिन्दा रहने के  मांसाहार खाना शुरू कर दिया और जैसी की प्रथा थी – अछूत घोषित हो गए।
Now come to the valid reason for Rigidity inIndian Caste System…
वर्ष 497 से 1197 तक भारत में एक से बढ़कर एक विश्वविद्यालय हुआ करते थे, जैसे तक्षशिला, नालंदा, जगदाला, ओदन्तपुर इत्यादि।

नालंदा विश्वविद्यालय में 10000 छात्र, 2000 शिक्षक नौ मंज़िल का पुस्तकालय हुआ करता था, जहाँ विश्व के विभिन्न भागों से पड़ने के लिए विद्यार्थी आते थे। ये सारे के सारे मुग़ल आक्रमण कारियों ने ध्वस्त करके जला दिए। न सिर्फ इन विद्या और ज्ञान के मंदिरों को जलाया गया बल्कि पूजा पाठ पर सार्वजानिक और निजी रूप से भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया। इतना तो सबने पढ़ा है, लेकिन उसके बाद यह नहीं सोचा कि अपने धर्म को ज़िंदा रखने के लिए ज्ञान, धर्मशास्त्रों और संस्कारों को मुंह जुबानी पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया गया । सबसे पहला खतरा जो धर्म पर मंडराया था, वो था मलेच्छों का हिन्दू धर्म में अतिक्रमण रोकना। और जिसका जैसा वर्ण था वो उसी को बचाने में लग गया। लड़कियां मुगलों के हरम में न जाएँ, इसलिए लड़की का जन्म अभिशाप होने लगा, छोटी उम्र में उनकी शादी इसलिए कर दी जाती थी किअब इसकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी इसका पति संभाले, मुसलमानों की गन्दी निगाह से बचने के लिए पर्दा प्रथा शुरू हो गयी। विवाहित महिलाएं पति के युद्ध में जाते ही दुशमनों के हाथों अपमानित होने से बचने के लिए जौहर करने लगीं, विधवा स्त्रियों को मालूम था की पति के मरने के बाद उनकी इज़्ज़त बचाने कोई नहीं आएगा इसलिए सती होने लगीं, जिन हिन्दुओं को घर से बेघर कर दिया गया उन्हें भी पेट पालने के लिए ठगी लूटमार का पेश अख्तिया करना पड़ा।

कौन सी विकृति है जो मुसलमानों के अतिक्रमण से पहले इस देश में थी और उनके आने के बाद किसी देश में नहीं है।

हिन्दू धर्म में शूद्र कृत्यों वाले बहरूपिये आवरण ओढ़ कर इसे कुरूप न कर दें इसलिए वर्णव्यवस्था कट्टर हुई, इसलिए कोई अतिशियोक्ति नहीं कि इस पूरी प्रक्रिया में धर्म रूढ़िवादी हो गया या उसमे विकृतियाँ आ गयी। मजबूरी थी वर्णों का कछुए की तरह खोल में सिकुड़ना।

यहीं से वर्ण व्यवस्था का लचीलापन, जो की धर्मसम्मत था, ख़त्म हो गया। इसके लिए आज अपने को शूद्र कहने वाले ब्राह्मणो या क्षत्रियों को दोष देकर अपने नए मित्रों को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं। वैसे जब आप लोग डा. सविता माई(आंबेडकर जी की ब्राह्मण पत्नी) के संस्कारों को ज़बरदस्ती छुपा सकते हैं, जब आप लोग अपने पूर्वजो के बलिदान को याद नहीं रख सकते हैं जिनकी वजह से आप आज भी हिन्दू हैं तो आप आज उन्मुक्त कण्ठ से ब्राह्मणो और क्षत्रिओं को गाली भी दे सकते हैं, जिनके पूर्वजों ने न जाने इस धर्म को ज़िंदा रखने के लिए क्या क्या कष्ट सहे वर्ना आज आप भी अफगानिस्तान, सीरिया और इराक जैसे दिन भोग रहे होते।

और आज जिस वर्णव्यवस्था में हम विभाजित हैं उसका श्रेय 1881 एवं 1902 की अंग्रेजों द्वारा कराई गयी जनगणना है जिसमें उन्होंने demographic segmentation को सरल बनाने के लिए हिंदु समाज को इन चार वर्णों में चिपका दिया।

कौन ज़िम्मेदार है इस पूरे प्रकरण के लिए अनजाने या भूलवश धर्म में विकृतियाँ लाने वाले पंडित? उन्हें मजबूर करने वाले मुसलमान आक्रांता? या आपसे सच्चाई छुपाने वाले इतिहास के लेखक? कोई भी ज़िम्मेदार हो पर हिन्दू भाइयो अब तो आपस में लड़ना छोड़ कर भविष्य की तरफ एक सकारात्मक कदम उठाओ। अगर पिछड़ी जाति के मोदी देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं, तो उतने ही पथ तुम्हारे लिए भी खुले हैं, मान लिया कल तक तुम पर समाज के बहुत बंधन थे पर आज तो नहीं हैं ।

वैसे सबसे मजे की बात यह है कि जिनके पूर्वजों ने ये सब अत्याचार किए, वो तो पाक साफ हो कर अल्पसंख्यकों के नाम पर आरक्षण भी पा गये और कटघरे में खड़े हैं, कौन – शायद हम और आप?

जवाब है आप के पास…?