Why are we Hindu?- Hindi and English

This question comes into my mind when every time I see comment by various Hindus claiming that they are Hindu. As a theology student, I believe that there is something which is not unique in definition as they say. Few common answer, I am referring below:-

1. I am born as a Hindu, that is why I am Hindu.

2. I do Poojas and follow customs of Hindu community, that is why I am Hindu.

3. I am Indian and Hindus are synonyms to Indian.

4. I follow Gurus and read Sastras so I am Hindu.

But I find that these all answer is not complete and not comprehended all aspect of being Hindu. Irrespective of many customs, Sastras, and Philosophy we still have not a single definition. But after studying the texts, I come into a common ground for this question.

I would like to confine it five points or five pillars of being Hindu.

1. Anyone who thinks Vedas as Authentic (not authoritative) texts for knowledge and foundation of customs is Hindu.

2. Anyone who believes in four basic principles of Vedas and Upanishads: Karm faal, Purusartha, Reincarnation, and Dharma is Hindu.

3. Anyone who believes that his basic philosophy is Veda, Vedanta, Agama, Siddhanta or Sagama is Hindu (I am not including Puran).

4. Anyone who believes that Bharat (From Himalayas to Kanyakumari and Burma to Afganistan) is the cradle of Dharma and Humanity is Hindu.

5. Anyone who believes that Reading, discussing, spreading and seeking the Vedas and Vedic meaning is his ultimate goal of being Dharmic is a Hindu.

In more short ways

“Anyone who considers Vedas as Authentic texts, believes in the principle of Vedas and follow the philosophy evolve from Vedas is Hindu with the compulsory duty of reading and seeking the meaning of universe for spreading the light of truth”

 

 

In Hindi,

हम हिंदू क्यों हैं? यह प्रश्न मेरे मन में आते हैं, हर बार जब मैं विभिन्न हिंदूओं द्वारा टिप्पणी करता हूं कि वे हिंदू हैं एक धर्मशास्त्र छात्र के रूप में, मुझे विश्वास है कि ऐसी कोई चीज है जो defi में परिभाषित नहीं है क्योंकि वे कहते हैं। कुछ सामान्य जवाब, मैं नीचे उल्लिखित हूं: –

  1. मैं हिंदू के रूप में जन्म लेता हूं, यही कारण है कि मैं हिन्दू हूं।
  2. मैं पूजा करता हूं और हिंदू समुदाय की रीति-रिवाजों का पालन करता हूं, यही कारण है कि मैं हिन्दू हूं।
  3. मैं भारतीय हूं और हिन्दू भारतीयों के समानार्थी हैं
  4. मैं गुरुओं का पालन करता हूं और शास्त्रों को पढ़ता हूं इसलिए मैं हिंदू हूं।

लेकिन मुझे लगता है कि ये सभी जवाब पूर्ण नहीं हैं और हिन्दू होने के सभी पहलुओं को संकुचित नहीं करते हैं। कई रिवाजों, शास्त्रों और दर्शनशास्त्र के बावजूद हम अभी भी एक भी परिभाषा नहीं है। लेकिन ग्रंथों का अध्ययन करने के बाद, मैं इस प्रश्न के लिए एक आम जमीन में आया हूं।

मैं इसे हिंदू होने के पांच अंक या पांच स्तंभों को सीमित करना चाहता हूं।

  1. जो कोई भी वेद को वास्तविकता के रूप में लिखता है (रिलायंस की स्थापना के लिए) प्रामाणिक (आधिकारिक नहीं) के रूप में हिंदू है
  2. जो कोई भी वेद और उपनिषदा के चार बुनियादी सिद्धांतों में अभिव्यक्त करता है: कर्म पुल, पुरुषार्थ, पुनर्जन्म और धर्म हिंदू हैं।
  3. जो कोई भी मानता है कि उसका मूल दर्शन वेद, वेदांत, अगम, सिद्धाता या सागामा हिंदू है (मैं पुराण भी नहीं पा रहा हूं)।
  4. कोई भी व्यक्ति जो यह मानता है कि भारत (हिमालय से कन्याकुमारी और बर्मा से अफगानस्तान तक) धर्म का मानवता है और मानवता हिंदू है।
  5. कोई भी व्यक्ति जो यह मानता है कि वेदों और वैदिक अर्थों को पढ़ना, चर्चा करना, फैलाना और उनकी मांग करना धर्मिक होना का अंतिम लक्ष्य एक हिंदू है।

 

6 comments

  1. वास्तविकता इससे परे है. ९९.९ हिंदू वेदोंको नही जानते. जो वेदोंको नही मानते ऐसे अवैदिकभी हिंदू कहलाते है. चार्वाक जैसे नास्तिक भी हिंदू धर्म का हिस्सा है.
    हिंदू एक समयसे साथ बदलता गया परिवर्तनशील व्यवस्था का नाम है. सदा परिवर्तन के साथ चलना, खुदकी चिकिस्ता के लिये तयार रहना, चिकित्सा के बाद परिवर्तन के तरफ जानेवाली व्यवस्था हिंदू कहलाती है. एक ही कालमे पैदा हूवी संस्कृतीयोंमे एकमात्र हिंदू संस्कृती बची हुई है, बाकी सभी इज्पिशियन, इराणीयन, मेसोपिटियन संस्कृती खत्म हो गयी. इस का एकमात्र कारण ये परिवर्तनशीलता ही है. इसलिये मै समझता हूं के हम वेदोंको पार करके आगे चले आये है. वेदोंमे आज के मनुष्य के लिये जो अच्छा है ऊसे हम स्विकार जरूर करेंगे, लेकिन उसकी चिकिस्ताही करेंगे.

    Liked by 1 person

    • मित्र आपकी बात सवर्था उत्तम है,

      1. हिन्दू वेदो को नही जानते सत्य है
      2. बुद्ध जैनी ओर चार्वाक कभी भी वैदिक दर्शन के नही वैदिक रिवाजो के विरुद्ध रहे, वैदिक दर्शन धम्मपद में विद्यमान है
      3 शमक्या वैदिक आस्तिक स्कूल होते हुए भी ईस्वर की मोजूदगी के विरुद्ध है फिर भी वेदो को उत्तम ना कि आधिकारिक ग्रंथ मानते है
      3. परिवर्तन होना ही चाहिए इसीलिए वेदो को में उत्तम ग्रंथ माना है आधिकारिक नही
      4.हमे वेदो के पार अवश्य जाना चहिय पर वेदो को त्याग कर। यही उन्हें अनुकूल बनाकर

      आपकी टिप्पणी वेदो को आधिकारिक मान के लिखी है जबकि मेने पहले ही पॉइंट में उन्हें आधिकारिक नही उत्तम ज्ञान स्त्रोत कहा है

      Liked by 1 person

  2. what Mr Surender depecits is true.but how many are following the Hindu dharma. In this busy world one cannot find time to do ‘Sandyavandhana’ then where we can call ourselves Hindus.As far as i know there is no meaning in this Dog eat Dog day.

    p

    Like

    • Dear, I agree with you. But things are subjected to change. People dnt follow dharma not because they dnt want to. They dnt follow becasue they are not aware that what dharma is. Pooja, Yagana, Idol worshiping is not real Vandana. vandana is implimenting the real teaching of Veda in life. Dharma is seeking meaning of life and spreading the light. I am aure that awarness about dharma will one day enlightend everyone. We just need to do effort for raising consiousness.

      Thanks
      Surender negi

      Like

  3. Many of the Hindus especially havr difficulty in going thro The BAGAVADGEETHA , because it is in sanskrit. When people from the southern part of India are opposing Hindi,which is simpler in nature,you are talking about VEDAS ,which is beyond the comprehenssion of even the knowledeable community- the Brahmins.Dont you think you are aspiring for the moo .

    Like

    • Agree, But I belive that an organised apporach can change the situation. Sanskrit is langugae while Vedas and Gita is philosophy. I believe that an Indian Centric institute who can control the nurrative will abolish the need of learing sanskrit. We can get an these correct interperation with right meaning. But I want them control by Indians not western like Sholdon and Wendy. Thanks

      Like

Comments are closed.