भारतीय समाज और बाबा के अंधविश्वास।

यदि किसी समाज का आर्थिक विकास की अपेक्षाकृत बौद्धिक विकास न हो तो वह समाज अंधविश्वासों में और भी गहरे धंसता चला जाता है। फिर उस समाज में लोगों के अंधविश्वास का फायदा उठाकर अपना घर भरने वाले परजीवियों का साम्राज्य विकसित होने लगता है।

भारत के मामले में यही हुआ है। 90 के दशक में उदारीकरण के बाद मध्यम वर्ग के लोगों के जीवन स्तर में तेजी से सुधार हुआ। इससे पहले जहाँ टीवी, फ्रिज और स्कूटर जैसे सुख साधन कुछ खास लोगों की पहुंच में ही हुआ करते थे, फिर ये आम लोगों की पहुंच में भी आने लगे। जब लोगों की आमदनी बढ़ी तो उसके साथ ही बाजार भी तरह तरह के उत्पादों से पट गया। फिर स्वयं को एक दुसरे से श्रेष्ठ और साधन संपन्न दिखाने की होड़ शुरू हुयी। इस होड़ ने मध्यम वर्ग की शांत जिन्दगी में खलबली मचा दी। एक दौड़ शुरू हो गई जिसमें सबको आगे निकलना था। महत्वकांक्षाओं से संचालित इस दौड़ ने लोगों के मन में भय, असुरक्षा और लालच को जन्म दिया। लालच से भरे डरे हुए लोग परजीवियों के लिए एक आसान शिकार थे। और इस शिकार के लिए उन्हें कोई विशेष प्रयास की आवश्यक्ता भी नहीं थी। उन्हें तो बस अपना मुहँ खोलकर बैठ जाना था, क्योंकि शिकार तो खुद ब खुद चलकर उनके पास आ रहा था।

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इस दौरान लोगों द्वारा धार्मिक कार्यों में किया जाने वाला खर्च अचानक ही बहुत बढ़ गया। पहले जहाँ धार्मिक आयोजन के नाम पर बस सत्यनारायण की कथा हुआ करती थी अब माता के जागरण जैसे भव्य आयोजन होने लगे। ऐसे आयोजनों ने लोगों को अपनी संपन्नता और धार्मिकता के प्रदर्शन का अवसर तो मुहैया कराया ही इनके साथ साथ दैवीय कृपा प्राप्त कर लेने का आश्वासन भी दिया। देखते ही देखते देश भर में जागरण पार्टियों की बाढ़ आ गई। इसके साथ ही धार्मिक पर्यटन और मंदिरों की आय में भी भारी वृद्धि हुयी।

इससे पहले जहाँ लोग जीवन में एक बार तीर्थ यात्रा संपन कर लेने को उपलब्धि मानते थे वहीँ अब पिकनिक की तरह तीर्थ यात्राएं होने लगीं। यहाँ तक की बद्रीनाथ केदारनाथ और अमरनाथ जैसे दुर्गम तीर्थ स्थलों पर भी लोग हर वर्ष हाजिरी देने जाने लगे। जो थोड़े कम साहसी थे उन्होंने अपने आस पास ही किसी धर्मस्थल को चुन लिया जहाँ वे नियमित अन्तराल पर हाजिरी लगाने जाने लगे। जैसे मथुरा वृन्दावन में हर सप्ताहांत पर आस पास की जगहों से लोग पहुँच जाते हैं। इनमें सबसे ज्यादा संख्या दिल्ली एनसीआर के संपन्न लोगों की होती है। इनमें से कुछ लोग तो ऐसे होते हैं जो हर सप्ताह दिल्ली से बिना नागा हाजिरी देने पहुँच जाते हैं। विशेष अवसरों पर तो यहाँ इतनी भीड़ जुटती है कि व्यवस्था चरमरा जाती है। तीर्थयात्रियों की बढती भीड़ को भुनाने के लिए पिछले कुछ वर्षों के दौरान यहाँ कई भव्य मंदिरों का निर्माण हुआ है।

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इसके साथ ही कथावाचकों और प्रवचनकर्ताओं का धंधा भी चल निकला। कथावाचकों के पंडालों में भीड़ उमड़ने लगी। आसाराम तथा उस जैसे कई अन्य कथावाचकों ने इस अवसर का जमकर लाभ उठाया और स्वयं को एक ब्रांड की तरह धर्म और अध्यात्म के बाजार में स्थापित कर लिया। उनके अनुयायियों की भारी भीड़ ने उनको शोहरत और राजनीतिक ताकत के साथ साथ ढेर सारा धन भी दिया। इस धन का उपयोग उन्होंने अपने प्रचार के लिए किया और इसके जरिये प्रचार के सबसे सशक्त माध्यम टीवी तक अपनी पहुँच बना ली। अब इनके प्रोग्राम टीवी पर प्रसारित होने लगे। लगभग सभी मुख्य चैनलों पर सुबह का स्लॉट इनके लिए बुक हो गया। टीवी पर आना इनके लिए बहुत फायदे का सौदा साबित हुआ। टीवी के जरिये इन्होने घर घर तक अपनी पहुँच बना ली और इनके अनुयायियों की संख्या और साथ ही लाभ में भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ोतरी हुई। इसने मिडिया जगत में कुछ लोगों के कान भी खड़े कर दिए। वे भी इस धर्म और अध्यात्म की बहती गंगा में लाभ की संभावनाएं तलाशने लगे।

मुंबई में एक प्रोडक्शन हाउस चला रहे भूतपूर्व पत्रकार माधव कान्त मिश्रा ने इस सम्भावना को सबसे पहले पहचाना और सन 2000 में उन्होंने आस्था नामक चैनल को लांच कर दिया। इस चैनल ने जनता तक अपनी पहुँच बनाने के लिए बेताब बहुत से गुरुओं और कथावाचकों के लिए संभावनाओं के द्वार खोल दिए। शुरू में इस चैनल पर प्रसारित होने वाली सामग्री के लिए कोई कीमत नहीं वसूली जाती थी। लेकिन बढती मांग ने इसको ज्यादा दिन फ्री नहीं रहने दिया। क्योंकि ऐसे बाबाओं और गुरुओं की कोई कमी नहीं थी जो खुद को टीवी पर दिखाने के लिए अच्छी खासी कीमत देने को तैयार थे। इस बढती मांग को भुनाने के लिए धडाधड धार्मिक चैनल लांच होने लगे। इन चैनलों में अधिकांश का स्वामित्व किसी न किसी धर्मगुरु के पास ही था। इस तरह इन चैनलों के जरिये ये दोहरा लाभ कमाने लगे। आस्था चैनल के स्वामित्व को भी बाद में बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने खरीद लिया। बाबा रामदेव को योगगुरु से एक सफल व्यवसायी के रूप में स्थापित करने में इस चैनल का बहुत बड़ा हाथ है।

टीवी के जरिये होने वाले प्रचार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि आप सीधे ही लक्षित उपभोक्ताओं तक पहुँच बना सकते हैं। आज के दौर में टीवी देखने में ज्यादा समय व्यतीत करने वाले अधिकांश लोग औसत बुद्धि के ही होते हैं। उनमें भी जो लोग धार्मिक चैनलों को देखते हैं वे तो बुद्धि में औसत से भी नीचे होते हैं। ऐसे लोगों को आसानी से बुद्धू बनाया जा सकता है।

इन चैनलों ने किसी तरह जजमानी करके गुजारा कर रहे ज्योतिषाचार्यों को भी संभावनाओं का मार्ग दिखाया। जीवन की दौड़ में आगे निकलने को लालायित और जीवन की अनिश्चितताओं से डरे हुए लोग अपना भविष्य जान लेने को आतुर थे। वो वह हर संभव तरकीब आजमा लेना चाहते थे जिससे वे किसी तरह सम्रद्धि हासिल कर सकें और जीवन की अनिश्चितताओं को लेकर संतुष्ट हो सकें। ऐसे लोगों का दोहन करने के लिए ज्योत्षी, वास्तुशास्त्री, हस्तरेखा विशेषज्ञ, तांत्रिक, टैरो कार्ड रीडर जैसे परजीवी तैयार बैठे थे। टीवी ने इनको अपने प्रचार का मंच उपलब्ध करा ही दिया था। कुछ ही समय में धार्मिक चैनलों पर ज्योतिष के प्रोग्रामों की लाइन लग गई। फुटपाथ पर बिकने वाली ज्योतिष की चार किताबें पढकर अपनी वाकपटुता और लोगों के ठगने के टैलेंट में निपुण लोग टीवी पर ख़रीदे हुए स्लॉट के जरिये प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य बन गए।

टीवी के जरिये ज्योतिष का इतना अंधाधुंध प्रचार हुआ कि लोग हर छोटी बड़ी बात के लिए ज्योत्षियों के पास भागने लगे। नयी कार निकालने से लेकर बच्चे के जन्म का मुहूर्त भी ज्योतिष के आधार पर निर्धारित किया जाने लगा। लोग अपने घर का नक्शा बनवाने के लिए आर्किटेक्ट के बजाये वास्तुशास्त्रियों को महत्व देने लगे और जिनके घर बन चुके थे वे अपने घर को वास्तु के अनुसार तोड़फोड़ कर ठीक कराने लगे। अब लगभग सभी लोगों के हाथों में जेमस्टोन और गले में तरह तरह के लॉकेट दिखाई देने लगे। ग्रहों को प्रसन्न करने के लिए लोग ज्योत्षियों की सलाह पर महंगे महंगे पूजा-पाठ, मन्त्र जाप और हवन इत्यादि करवाने लगे।

ये चैनल ठगों के लिए इतना उपयोगी माध्यम साबित हुए की कल तक अख़बारों के क्लासिफाइड, बसों, ट्रेनों और सार्वजानिक शौचालयों में पर्चे चिपकाकर अपना प्रचार करने वाले बाबा बंगाली भी टीवी पर अपनी दुकान खोलकर बैठ गए। फिर समोसे को लाल हरी चटनी से खाने पर भी कृपा आने लगी। बस स्टैंड के पीछे, पीपल के पेड़ के नीचे मर्दाना कमजोरी का इलाज करने वाले हकीम जी भी टीवी पर पहुँच गए। मोटापा, डायबिटीज, कैन्सर, माइग्रेन, अस्थमा जैसी बिमारियों के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के नाम पर तरह तरह के उत्पाद बेचे जाने लगे। जिन लोगों ने कभी कॉलेज का मुहँ भी नहीं देखा वे भी टीवी पर डॉ साहब, वैध जी, हकीम जी के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

बरहाल ये दौर अभी भी जारी है और निकट भविष्य में भी इसमें किसी बड़े बदलाव के आसार फ़िलहाल दिखाई नहीं दे रहे हैं। अन्धविश्वास का जहर आज भी लगातार विभिन्न माध्यमों से समाज में फैलाया जा रहा है। भारत में तेजी से पैर पसारते बाबावाद के पीछे यही प्रचार जिम्मेदार है जिसका पैसा आता तो अमीरों की जेब से है, लेकिन इससे सबसे ज्यादा नुकसान निम्न वर्ग के लोगों का हुआ है। क्योंकि रईस लोगों ने तो केवल अपना थोड़ा सा धन खोया, लेकिन वे गरीब लोग जो किसी तरह कठिनाईयों में अपना जीवनयापन कर रहे हैं अपना सब कुछ लुटा बैठे। जिन बाबाओं और गुरुओं को वे ईश्वर के समकक्ष मान कर अपने उद्धार की आशा कर रहे थे उन्होंने न केवल उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से ठगा बल्कि उनकी बहन बेटियों की इज्जत भी तार-तार कर डाली

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